कांगड़ा घाटी


दैनिक ऊहापोह तथा चिलचिलाती गर्मी से निजात पाने के लिए हम पर्यटन मानचित्र पर अंकित सर्द दिशाओं में किसी शांत स्थान की तलाश कर रहे थे। तब हमारी नजर कांगड़ा घाटी नामक बिंदु पर आ ठहरी। हमें लगा हमारी तलाश पूरी हो गई। कांगड़ा घाटी हमारे देश की सुंदरतम घाटियों में से एक है। वहां की सुरम्य वादियां प्रकृति की गोद में समाई लगती हैं। हवाओं के साथ हिलते वृक्ष स्वागत में बांहें पसारे प्रतीत होते हैं। ढलानों पर दिखते चाय बागान किसी हरे आंचल की मानिंद नजर आते हैं। वहां की आबोहवा स्वास्थ्य के अनुकूल महसूस होती है।
अपना गंतव्य तय करने के बाद हम सोचने लगे कि वहां कैसे जाएं। दरअसल मेरा मानना है कि जो आनंद हमें पर्यटन स्थल पर पहुंचकर मिलता है, वैसा ही आनंद गंतव्य की यात्रा में भी महसूस हो तो सफर का मजा वास्तव में दोगुना हो सकता है। कांगड़ा घाटी की यात्रा के लिए हमने यही प्रयास किया। इस यात्रा के लिए हमने कांगड़ा क्वीन नामक टॉय ट्रेन के रूप में एक धीमे सफर का विकल्प चुना। यह कांगड़ा वैली रेलवे की एक विशेष रेलगाड़ी है जो रेल पर्यटन के उद्देश्य से ही चलाई गई है। यह रेलगाड़ी पठानकोट से सफर आरंभ कर, कांगड़ा घाटी के मध्य बसे पालमपुर तक ले जाती है।
शुरू हुआ सफर
कांगड़ा घाटी कोई छोटा सा स्थान नहीं, बल्कि एक विस्तृत घाटी है। धौलाधार पर्वत श्रृंखला तथा शिवालिक की निचली पहाडि़यों के मध्य पसरी इस घाटी का आकार करीब-करीब एक विशाल आयत जैसा है जिसकी लंबाई लगभग 90 मील और चौड़ाई लगभग 30 मील तक है। कांगड़ा घाटी रेलवे ट्रैक इस घाटी की जीवन रेखा के समान है। 164 किलोमीटर का यह रेलपथ पठानकोट से जोगेंद्र नगर तक है। कांगड़ा में अनेक तीर्थस्थल एवं कुछ मनोरम सैरगाह भी मौजूद हैं।
सुबह पठानकोट रेलवे स्टेशन पर पहुंचकर हमने कांगड़ा क्वीन का टिकट लिया और नैरोगेज प्लेटफॉर्म पर आ गए। वहां नैरोगेज का छोटा-सा लोकोमेटिव अपने साथ द्वितीय श्रेणी, कुर्सीयान एवं प्रथम श्रेणी की बोगी लिए खड़ा था। मात्र चार बोगी की इस छोटी-सी ट्रेन की द्वितीय श्रेणी में आरामदेह सीटें, कुर्सीयान में पुशबैक सीट तथा प्रथम श्रेणी में लग्जरी सोफे लगे थे। हमने अपना सामान प्रथम श्रेणी की बोगी के पहले कूपे में रखा। खिड़कियों पर लगे पर्दे कूपे की शोभा बढ़ा रहे थे। दीवार पर सुंदर पेंटिंग तथा फूलदान सजे थे। साथ ही धीमा-धीमा संगीत बज रहा था। ठीक आठ बजे इंजन ने सीटी दी और कुछ देर बाद टॉय ट्रेन ने प्लेटफार्म छोड़कर गति पकड़ ली। तभी कुछ पल के लिए संगीत रुका और स्पीकर से आती एक मधुर आवाज ने कांगड़ा क्वीन के यात्रियों का स्वागत किया तथा मार्ग का विवरण देते हुए शुभयात्रा की कामना की। संगीत पुन: आरंभ हो गया। ट्रेन जब डलहौजी रोड स्टेशन से गुजर रही थी, तभी कूपे में हमारे लिए सुबह का नाश्ता सर्व किया गया। इसके साथ गर्म चाय का फ्लास्क तथा मिनरल वाटर भी यात्रियों को दिया जाता है। कांगड़ा घाटी की निचली पहाडि़यों में प्रवेश करते ही ट्रेन पूर्व दिशा की ओर ऊंचाई पर बढ़ने लगती है। यहीं से कांगड़ा वैली रेलवे का खूबसूरती भरा घुमावदार रास्ता आरंभ हो जाता है।
कहानी रेल पथ की
रोचक रही है यहां के रेलपथ की कहानी। 1920 के दशक में जब कांगड़ा वैली रेलवे की शुरुआत हुई थी तब इस मार्ग पर ऐसा आरामदेह सफर नहीं था। दरअसल कालका-शिमला रेलवे के समान कांगड़ा घाटी रेलपथ कभी अंग्रेजों की विलासितापूर्ण यात्राओं का मार्ग नहीं रहा। शायद यही कारण है कि यह रेलमार्ग इतना प्रसिद्ध न हो सका। देश के विभिन्न क्षेत्रों में नैरोगेज रेल निर्माण जब अपने अंतिम दौर में था तब इस रेल पथ का निर्माण हुआ था। मजे की बात यह है कि इस रेलपथ के निर्माण का उद्देश्य एक विशाल बांध के निर्माण के लिए भारी सामान एवं मजदूरों को बांध की साइट तक पहुंचाना था। इसलिए इस मार्ग पर कोई पर्यटनस्थल विकसित नहीं हुआ।
कांगड़ा घाटी के प्राकृतिक रूप को बिना क्षति पहुंचाए इस मार्ग पर लाइन बिछाना रेलवे इंजीनियरों का एक करिश्मा कहा जाएगा। इसीलिए धीरे-धीरे यह रेलपथ सैलानियों को प्रभावित करने लगा। वैसे तो कांगड़ा घाटी क बहुत से महत्वपूर्ण स्थल इस रेलमार्ग से जुड़े हैं किंतु फिर भी हर स्थान को रेल यात्रा द्वारा देखना सुविधाजनक नहीं है। जबकि पालमपुर एक ऐसा स्थान है, जिसे आधार बनाकर कांगड़ा घाटी के हर दर्शनीय स्थान की सैर की जा सकती है। इसलिए यह रेलगाड़ी पालमपुर तक चलाई गई है।
छोटा-सा पहाड़ी शहर
लगभग एक घंटे के सफर के बाद कांगड़ा क्वीन नूरपुर स्टेशन के सामने से गुजरती है। मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां के नाम पर बसा यह एक छोटा-सा पहाड़ी शहर है। यहां एक किला एवं कृष्ण मंदिर दर्शनीय है। आज यह शहर कुल्लू शॉल की बुनाई का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। नूरपुर के बाद रेलमार्ग दक्षिण पूर्व दिशा को मुड़ता है। नंदपुर, भीताली, गुलेर जैसे स्टेशनों को पीछे छोड़ यह रेलगाड़ी सबसे पहले ज्वालामुखी रोड स्टेशन पर रुकती है। यह स्टेशन समुद्रतल से 379 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। प्रसिद्ध ज्वालामुखी तीर्थ इस स्टेशन से करीब 15 किलोमीटर दूर है। ज्वालामुखी रोड स्टेशन के बाद इस मार्ग के दो खास आकर्षण पर्यटकों को रोमांचित कर देते हैं। पहले तो कांगड़ा क्वीन गहरी खाई में बहती एक नदी पर बने ऊंचे अर्धवृत्ताकार पुल से गुजरती है। उसके बाद इस मार्ग पर दो सुरंगें आती हैं। इनमें से पहली सुरंग की लंबाई 250 फुट है तथा दूसरी सुरंग 1070 फुट लंबी है।
आकर्षक स्टेशन कांगड़ा
संगीत को बीच में रोककर सुरंगों के आने की पूर्व सूचना तथा कूपे की लाइट ऑन करने की हिदायत दी जाती है। जब रेलगाड़ी इन सुरंगों से गुजरती है तो यात्रा कर रहे बच्चे रोमांच से चीख उठते हैं। दूसरी सुरंग पार करके कांगड़ा क्वीन कुछ देर बाद ही कांगड़ा स्टेशन पर आ ठहरती है। लगभग 686 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह स्टेशन का ढलवां छत पहाड़ी शैली के भवनों के समान है जो देखने में सुंदर लगता है। साफ-सुथरे इस आकर्षक स्टेशन पर अधिक भीड़ न थी। कुछ तीर्थयात्री एवं स्थानीय लोग अन्य गाडि़यों की प्रतीक्षा में खड़े थे। कांगड़ा के बाद ज्यों-ज्यों ऊंचाई बढ़ने लगी, हवाओं में शीतलता का एहसास होने लगा। खिड़की से नजर आते प्राकृतिक दृश्यों का सिलसिला अनवरत जारी था। कहीं मार्ग के दोनों ओर रंग-बिरंगे फूलों से लदी झाडि़यां स्वागत करती लगतीं तो कहीं दूर तक फैले विस्तार में धान के खेत नजर आते। कुछ देर बाद इनकी पृष्ठभूमि में ऊंचे शिखर भी दिखाई देने लगे। धौलाघाट के ये पर्वत शिखर अपने अप्रतिम सौंदर्य से भरमाने लगे थे। तभी अचानक संगीत बंद हो गया। उसी मधुर आवाज ने पालमपुर के आगमन की पूर्व सूचना दी तथा कांगड़ा क्वीन में सफर के लिए धन्यवाद कहा।
पालमपुर के छोटे से सुंदर स्टेशन पर उतरकर हमने शहर के विषय में जानकारी एकत्र की और बाहर आ गए। मुख्य शहर स्टेशन से तीन किलोमीटर दूर है। वहां से टैक्सी द्वारा हम होटल पहुंचे। वैसे तो कांगड़ा क्वीन का सफर आरामदेह था, किंतु घुमावदार मार्ग के कारण हलकी सी थकान महसूस हो रही थी। हमने विश्राम के बाद होटल से निकलना तय किया। पालमपुर कांगड़ा घाटी का एक प्रमुख एवं दूसरा सबसे बड़ा शहर है। समुद्रतल से 1205 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह शहर एक सैरगाह के रूप में तेजी से विकसित हो रहा है। पालमपुर के नाम की उत्पत्ति स्थानीय बोली के ‘पुलम’ शब्द से हुई थी जिसका अर्थ है पर्याप्त जल। वास्तव में इस क्षेत्र में जल की कोई कमी नहीं। हर ओर जल के सोते, झरने एवं नदियां हैं। यही कारण है कि इस क्षेत्र की हवाएं शीतलता के साथ कुछ नमी भी लिए हैं। हवाओं की यह नमी तथा पहाड़ी ढलानों पर खुलकर पड़ती सूर्य की किरणों के कारण ही यहां की जलवायु चाय की खेती के अनुकूल बन पड़ी। कांगड़ा घाटी के इस क्षेत्र की विशेषता को भांप कर 1849 में डॉ. जेमसन ने यहां पहली बार चाय की खेती की थी। बाद में उन्होंने यहां बड़े चाय बागान स्थापित किए। धीरे-धीरे यह क्षेत्र चाय बागान से घिर गया। यही नहीं 1880 के दशक तक कांगड़ा चाय विश्वप्रसिद्ध हो चुकी थी। एक पठारी भाग पर स्थित पालमपुर इन चाय बागान के मध्य ही बसा है।
सैर चाय बागान की
दोपहर बाद हम पालमपुर का सबसे बड़ा पर्यटन आकर्षण यानी चाय बागान देखने पैदल ही निकल पड़े। सुभाष चौक से थोड़ा आगे एक मार्ग न्युगल की ओर जाता है। उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए हमें मार्ग के दोनों ओर चाय बागान नजर आने लगे। ढाई-तीन फुट ऊंचे, चाय के झाड़ीनुमा पौधों पर हरी पत्तियों के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा था। बाग में काम करती स्त्रियां उन्हीं में से सही पत्ती चुनकर अपनी कमर पर बंधी टोकरी में डाल रही थीं। अपने काम में तन्यमता से लगी ये स्ति्रयां बड़ी तेजी से पत्तियां चुन रही थीं। कहीं-कहीं कुछ पुरुष भी इस काम में लगे थे। चाय के पौधों के मध्य घूमकर हमने उन्हें करीब से देखा, जो हमारे लिए एक अनोखा अनुभव था।
पर्यटक चाहें तो पालमपुर में कोआपरेटिव टी फैक्ट्री में चाय की प्रोसेसिंग का कार्य भी देख सकते हैं। वहां जाकर पता चलता है कि अंग्रेजों ने कांगड़ा चाय की खेती को बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से विकसित किया था। तभी आज कांगड़ा वैली टी की उच्च गुणवत्ता विश्वप्रसिद्ध है। यहां से चाय को अनेक देशों को निर्यात किया जाता है।
उसी मार्ग पर चाय बागान की खूबसूरती को आत्मसात करते हुए हम न्युगल खड की ओर बढ़ गए। पठार के छोर पर एक खड़ी चट्टान पर स्थित यह एक पिकनिक स्पॉट है जहां हर ओर प्राकृतिक सुषमा का साम्राज्य है। यहां पर्यटन विभाग का न्युगल कैफे भी है। न्युगल खड करीब एक हजार फुट चौड़ी एक गहरी खंदक के समान है, जिसके मध्य बांदला जलधारा बह रही है। हम लोग काफी देर न्युगल कैफे के मुक्ताकाश हिस्से में बैठे रहे। जहां शांत वातावरण और सुकून भरी जलवायु ने हमें मुग्ध ही कर दिया। वहां से नजर आने वाले दृश्य अद्भुत ही नहीं रोमांच भरे भी थे। एक ओर चाय बागान की हरीतिमा बिखरी है तो दूसरी ओर धौलाधार पर्वतमाला की। 5000 फुट से भी ऊंची चोटियां अकलंक शुभ्रता का हिम मुकुट पहने खड़ी हैं। यहां पहुंच कर ऐसा महसूस होता है कि कुदरत जब अपनी अंजुरी से सौंदर्य बिखेर रही थी तो शायद यहां उसने पूरी अंजुरी ही उड़ेल दी थी। तभी यहां आने वाले सैलानी स्वयं को किसी सम्मोहन में कैद समझने लगते हैं। इस स्थान के निकट ही पांच शताब्दी पुराना बांदला माता मंदिर तथा विंध्यवासिनी मंदिर भी दर्शनीय है। कांगड़ा घाटी के चाय बागान लगभग दो हजार एकड़ में फैले हैं। इनके अलावा यहां चीड़ एवं देवदार आदि के वृक्षों की भरमार भी है।
न्युगल खड से वापस आकर हम पालमपुर के बाजार में पहुंचे। यहां एक ही मुख्य मार्ग है जिसके दोनों ओर पूरा बाजार है। बाजार में अच्छी रौनक देखने को मिलती है। यहीं कुछ छोटे रेस्तरां और फास्टफूड केंद्र हैं। यहां का बाजार पर्यटकों को ज्यादा आकर्षित नहीं करता। हमें यहां घडि़यों, आभूषणों और जूतों आदि की दुकानें अधिक नजर आई। शायद आसपास के गांवों के लिए खरीदारी का यह प्रमुख केंद्र है।
पालमपुर कांगड़ा घाटी का एक ऐसा केंद्र है, जहां से घाटी के अनेक दर्शनीय स्थल देखे जा सकते हैं। दूसरे दिन हम प्रसिद्ध कांगड़ा जी तथा ज्वाला जी मंदिर देखने चल दिए। यह स्थान कांगड़ा की नीची पहाडि़यों पर स्थित है इसलिए टैक्सी से आगे बढ़ते हुए चाय बागान के बाद धान के खेत नजर आने लगे। धान की लहलहाती खेती ने हर ओर चमकते हरे रंग की छटा बिखेर रखी थी। सीढ़ीनुमा खेतों का यह रूप अत्यंत मनोहारी था। ऐसे ही सुंदर मार्ग से होकर सैलानी कांगड़ा पहुंच जाते हैं। कांगड़ा का इतिहास काफी पुराना है। इसका प्राचीन नाम नगरकोट था। महाभारत काल में कौरवों के पक्ष में लड़ने वाले कटोच राजाओं के वंशज यहां राज्य करते थे। बाणगंगा और माझी नदी के संगम के निकट पहाड़ी पर यहां का एक हजार वर्ष पुराना किला आज भी उस दौर का मूक गवाह है। किंतु 1620 में मुगल बादशाह जहांगीर ने यहां कब्जा कर लिया था। 18वीं शताब्दी में राजा संसार चंद द्वितीय ने इसे मुगलों से पुन: प्राप्त कर लिया। 1905 में आए भूकंप से यहां के किले को भारी क्षति पहंुची। जिस किले की हर दीवार कभी गुलेर कांगड़ा शैली के मनमोहक चित्रों से सजी रहती थी, आज वह किला खंडहर में तब्दील हो रहा है। किले के कई प्राचीन चित्र चिम्बा, दिल्ली एवं चंडीगढ़ के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।
कांगड़ा के खास मंदिर
आज कांगड़ा की प्रसिद्धि यहां स्थित बज्रेश्वरी देवी के मंदिर के कारण अधिक है। जिसे नगरकोट कांगड़े वाली देवी भी कहा जाता है। हजार वर्ष पूर्व यहां भी बड़ा ही भव्य और समृद्ध मंदिर था। मंदिर की हीरे-मोती, सोने-चांदी की संपदा की ख्याति दूर तक फैली थी। किंतु 1009 में महमूद गजनवी, 1337 में मुहम्मद बिन तुगलक तथा 1420 के आसपास सिकंदर लोदी ने आक्रमण कर यहां की संपदा लूट ली। आक्रांताओं के हर आक्रमण के बाद यह मंदिर पुन: निर्मित हुआ। किंतु भूकंप ने इसे फिर क्षतिग्रस्त कर दिया। उसके बाद 1920 में वर्तमान मंदिर निर्मित किया गया। छोटी-छोटी गलियों से होकर हम मंदिर परिसर में पहुंचे। मंदिर के गर्भगृह में पिंडी के रूप में देवी के दर्शन होते हैं। परिसर में बहुसंख्या में पीले वस्त्र पहने लोगों को देख हमने इस विषय में किसी से पूछा तो एक अनोखी बात मालूम हुई। मान्यता है कि अपने सगे संबंधियों के साथ पीले वस्त्र धारण कर देवी की स्तुति करें तो पुत्र प्राप्ति की कामना पूर्ण होती है। इसी कामना से दूर दराज के गांवों से विशेषकर हिमाचल प्रदेश व उत्तर प्रदेश से लोग यहां आते हैं। पीले वस्त्रधारियों की भीड़ में कुछ समृद्ध पढ़े-लिखे लोगों को देख हमें कुछ ठेस लगी थी कि आज भी लोगों में पुत्र प्राप्ति की इतनी लालसा है। कांगड़ा में श्री कृपालेश्वर मंदिर, वीरभद्र मंदिर, कुरुक्षेत्र कुंड तथा गुप्त गंगा आदि दर्शनीय स्थान हैं। यहां से लगभग 15 किलोमीटर दूर मसरूर नामक स्थान पर 10वीं शताब्दी के 15 मंदिर दर्शनीय हैं।
कांगड़ा से हम 34 किलोमीटर दूर ज्वाला जी मंदिर पहुंचे। इसे ज्वालामुखी मंदिर भी कहा जाता है। यह पवित्र स्थल देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि इस स्थान पर सती की जिह्वा गिरी थी। यहां चट्टान की दरारों से निरंतर एक ज्वाला प्राकृतिक रूप से जलती रहती है। नीले रंग की यह ज्वाला ही देवी स्वरूप पूजी जाती है। मंदिर में देवी की प्रतिमा भी विद्यमान है। यहां अलग-अलग स्थान पर ज्वालाएं प्रज्वलित हैं जिन्हें देवी के नौ स्वरूप माना जाता है। परिसर के अन्य भवनों के मध्य अवस्थित मुख्य मंदिर अपनी स्वर्ण आभा से भक्तों को प्रभावित करता है। मंदिर का गुंबद पूरी तरह स्वर्ण से मढ़ा है। इस विषय में एक मत है कि एक बार मुगल बादशाह अपनी हिंदू पत्‍‌नी जोधाबाई के साथ ज्वाला जी दर्शन के लिए आए थे। तब मंदिर से प्रभावित होकर उन्होंने यह स्वर्ण पत्र मढ़वाया था। बहुत से लोगों का मानना है कि गुंबद पर यह स्वर्ण पत्र महाराजा रणजीत सिंह द्वारा मढ़वाया गया था। ज्वालामुखी मंदिर की देखरेख बाबा गोरखनाथ के अनुयायियों द्वारा की जाती है। राधाकृष्ण मंदिर, अम्बिकेश्वर महादेव, लाल शिवालय तथा गोरखटिब्बी यहां के अन्य  दर्शनीय धार्मिक स्थान हैं। शाम होने तक हम पालमपुर वापस आ गए।
पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण
अगले दिन सुबह हमने प्राचीन बैजनाथ मंदिर की ओर प्रस्थान किया। लगभग 1200 वर्ष पुराना बैजनाथ मंदिर वास्तुशिल्प एवं पुरातत्व की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां शिव को बैद्यनाथ के रूप में पूजा जाता है। बैजनाथ उसी का अपभ्रंश है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग देश के 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है। इस तरह यह मंदिर धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस स्थान के संबंध में मान्यता है कि रावण ने इसी स्थान पर अपना शीश दस बार भगवान शिव को समर्पित किया था। विशाल परिसर में स्थित मंदिर के आसपास सुंदर उद्यान है, जहां से धौलाधार के शिखरों की कतार नजर आती है। शिवरात्रि के मौके पर यहां भव्य मेला लगता है।
बैजनाथ से हम कलाप्रेमियों के तीर्थ आंद्रेटा पहुंचे। आंद्रेटा वैसे तो एक छोटा सा कस्बा है, लेकिन कुछ प्रसिद्ध कलाकारों की कर्मभूमि रहने के कारण यह काफी प्रसिद्ध है। प्रथमत: यह स्थान गांधी जी की शिष्या नोरा रिचर्ड की स्मृतियों से जुड़ा है। नोरा रिचर्ड ग्रामीण एवं पंजाबी थियेटर को पूर्णतया समर्पित थीं। यहां तक कि उन्हें पंजाबी थियेटर की नानी की उपमा दी जाती थी। उनके अलावा यह स्थान प्रसिद्ध चित्रकार पद्मश्री सोभा सिंह एवं बीसी सान्याल से संबंधित भी है। सोभा सिंह की प्रोटे्रट बनाने की एक खास शैली थी। उनके द्वारा बनाए चित्रों में सोहनी-महिवाल, हीर-रांझा, उमर खय्याम तथा कांगड़ा दुलहन का चित्र बहुत प्रसिद्ध है। आंद्रेटा में उनकी एक कलादीर्घा भी है। जिसे देखने सैकड़ों चित्रकला प्रेमी यहां अवश्य आते हैं। यहां प्रदर्शित चित्रों में उनकी बिंदास शैली देखते ही बनती है। आंद्रेटा में एक पॉटरी केंद्र व संग्रहालय है जहां टेराकोटा पाटरी के बेहतरीन नमूने प्रदर्शित हैं। पटियाला की पंजाबी यूनिवर्सिटी द्वारा कलाकारों के लिए यहां राइटर्स हाउस की स्थापना की गई है। यहां के शांत, ग्रामीण परिवेश में घूमते हुए सैलानी स्वयं को प्रकृति के और निकट महसूस करते हैं। शायद इसीलिए कलाप्रेमियों को भी यह स्थान भा गया होगा।
प्रकृति की गोद में पहुंचकर वास्तव में इंसान को ईश्वर की निकटता का एहसास होता है। यही कारण है कि प्राकृतिक वैभव से घिरा पालमपुर अनेक धार्मिक स्थलों से भी घिरा है। अगले दिन हम ऐसे ही एक और धार्मिक स्थल चामुंडा मंदिर चल दिए। देवी चामुंडा मां काली का ही एक रूप हैं। यह स्थान चामुंडा नंदिकेश्वर धाम के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल यह शिव एवं शक्ति दोनों का स्थान है। बाण गंगा के तट पर स्थित यह धाम एक उग्र सिद्धपीठ है। इसलिए यह योगियों, साधकों के अलावा तांत्रिकों की साधना स्थली भी है। मान्यता यह है कि मां काली ने जिस रूप में यहां चंड-मुंड राक्षसों का अंत किया था वह रूप ही चामुंडा के नाम से पूजा जाने लगा। यहां आने वाले तीर्थयात्री बाणगंगा के घाट पर या परिसर में बने जलाशय में स्नान करने के बाद देवी के दर्शन करते हैं। मुख्य मंदिर के साथ ही संकटमोचन हनुमान तथा काली की प्रतिमा भी दर्शनीय है। पहाड़ों में अपने गांव से देवी-देवताओं की डोली तीर्थ स्थलों पर लाने की परपंरा यहां भी देखने को मिली।  नवरात्रों के अवसर पर यहां बड़ी भारी भीड़ होती है। कांगड़ा घाटी का एक और पर्यटन स्थल धर्मशाला चामुंडा से मात्र 18 किलोमीटर दूर है। किंतु समय के अभाव के कारण हम वहां नहीं गए। दरअसल धर्मशाला अपने आपमें एक पूर्ण सैरगाह है। इसलिए वह स्थान हमने भविष्य में एक अलग यात्रा में घूमने का निर्णय लिया था। लेकिन चामुंडा मंदिर से वापस आते हुए हम गोपालपुर वन्यजीव उद्यान देखने जरूर रुके। दोपहर तक पालमपुर पहुंच गए। वह शाम भी हमने चाय बागान के मध्य घूमते हुए व्यतीत की।
साहसिक खेलों के लिए आदर्श स्थान
कांगड़ा घाटी साहसिक खेलों के लिए एक आदर्श स्थान है। यहां अनेक ऐसे ट्रेकिंग रूट हैं जो मतवाले ट्रेकर्स को निमंत्रण देते हैं। इस रूट के जरिये ट्रेकर्स वारू पास होकर पालमपुर से होली नामक स्थान, इंद्राहार पास से धर्मशाला तक बैजनाथ से थामसर पास होकर मनाली जा सकते हैं। इन मार्गो पर ट्रेकिंग के लिए मई से अक्टूबर तक का समय उपयुक्त होता है। जिस मार्ग पर भी निकल जाएं प्रकृति का सान्निध्य आपका मन जरूर मोह लेगा। ऊंची पहाडि़यों पर भेड़ चराते हुए गद्दी लोग हर जगह आपका स्वागत करते नजर आएंगे। ये लोग नीचे पहाड़ी गांवों में रहते हैं तथा खेती करते हैं। किंतु गर्मियों में ये ऊंची पहाडि़यों पर भेड़ चराने पहंुच जाते हैं। पुरुषों के जाने के बाद खेती का काम स्ति्रयां देखती हैं। कुर्ता और तंग पजामी पहने, कमर पर बेल्ट के समान रस्सी लपेटे तथा सर पर टोपी पहने ये लोग अलग ही पहचाने जाते हैं। बंजारा प्रवृत्ति के ये लोग हमेशा पर्यटकों को सहयोग देते हैं। अपनी मस्त जीवनशैली के कारण ये कठिन परिस्थितियों में भी मस्त रहते हैं। कांगड़ा घाटी के बीड़ एवं बिलिंग नामक स्थान पैराग्लाइडिंग के लिए प्रसिद्ध हैं। ये स्थान भी पालमपुर से अधिक दूर नहीं हैं। मई-जून के माह में यहां पैराग्लाइडिंग रैली का आयोजन भी होता है। इनकी गिनती देश के महत्वपूर्ण पैराग्लाइडिंग स्थलों में होती है।
कांगड़ा पेंटिंग
कांगड़ा घाटी की कांगड़ा पेंटिंग भी विश्व में प्रसिद्ध है। 18वीं शताब्दी के मध्य में कांगड़ा की खास चित्रकला शैली का उदय हुआ था। 1739 में नादिर शाह द्वारा दिल्ली पर आक्रमण करने पर बहुत से कलाकारों ने पश्चिम हिमालय के राज्यों की ओर पलायन कर लिया। वहां के राजाओं ने इन्हें प्रश्र्रय दिया तथा इनकी कला को प्रोत्साहित किया। उन्हीं दिनों में यहां लघुचित्रों की एक खास शैली प्रचलित हुई। यह कांगड़ा लघुचित्र शैली कहलाने लगी। कांगड़ा घाटी के नूरपुर, गुलेर, कांगड़ा, नादौन तथा सुजानपुरटीरा में इसे फलने-फूलने का भरपूर अवसर मिला। जयदेव एवं केशवदास जैसे कवियों की कविताओं से उद्धृत दृश्य इन लघुचित्रों के विषय बन गए। इनके खास चरित्र राधा एवं कृष्ण रहे। कांगड़ा लघुचित्र शैली के नमूने आज देश के महत्वपूर्ण संग्रहालयों के अलावा विदेशों के संग्रहालयों की भी शोभा बढ़ा रहे हैं।
घाटी में हम जिस ओर भी जाते स्थानीय वेशभूषा में खुशमिजाज लोग नजर आते। प्राय: पुरुष अच्छी कद-काठी के होते हैं। स्त्रियों के खनकते गहनों से उनका आभूषण प्रेम झलकता था। यहां अधिकतर घर स्लेट पत्थर की छतों के नजर आते हैं। कहीं समृद्ध लोगों के कोठीनुमा घर भी दिखाई देते हैं।
कांगड़ा घाटी का वापसी सफर भी हमने कांगड़ा क्वीन के हसीन सफर के रूप में किया। वहां से हम अपने साथ प्राकृतिक, ऐतिहासिक और आस्थापूर्ण स्मृतियां लेकर लौटे।

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