कौसानी कण-कण में बसा सौंदर्य



कौसानी के बारे में 11 जुलाई 1929 के यंग इंडिया में महात्मा गांधी ने लिखा था, मैं साश्चर्य सोचता हूं कि इन पर्वतों के दृश्यों व जलवायु से बढकर होना तो दूर रहा, बराबरी भी संसार का कोई अन्य स्थान नहीं कर सकता। हमारे देशवासी स्वास्थ्य लाभ के लिए यूरोप क्यों जाते होंगे? समुद्र तल से 1890 मीटर की ऊंचाई पर बसे कौसानी के प्राकृतिक सौंदर्य व शांत मनोरम वातावरण से प्रभावित होकर महात्मा गांधी ने वर्ष 1929 में यहां 12 दिन बिताए थे और अनासक्ति योग नामक पुस्तक की रचना की थी।
अनासक्ति आश्रम
गांधी जी जिस बंगले में ठहरे थे वह आज उनकी लिखी पुस्तक के नाम पर अनासक्ति आश्रम के नाम से जाना जाता है। अब यहां पर्यटकों के ठहरने व अध्ययन की पर्याप्त व्यवस्था का संचालन गांधी स्मारक निधि द्वारा किया जाता है। हिमालय में कुछ ही ऐसे पर्यटन स्थल होंगे जो कौसानी की खूबसूरती और प्राकृतिक सुषमा का मुकाबला कर सके।
उत्तराखंड के जनपद बागेश्वर की पहाडियों और वृक्षों की गोद में स्थित कौसानी से 300 किलोमीटर के अ‌र्द्धवृत्ताकार घेरे में फैली बर्फ से ढकी चौखंबा, त्रिशूल, नंदादेवी, पंचाचूली और नंदाकोट सहित कई अन्य चोटियां इस जगह को भव्य रूप प्रदान करती हैं। इसके एक ओर कोसी और दूसरी तरफ गोमती नदी बलखाती चलती हैं जिसके मध्य में प्रहरी की तरह खडे पिंगनाथ शिखर पर कौसानी बसा है। पहले यह स्थान वलना नाम से जाना जाता था। कौसानी नाम बाद में पडा। इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन समय में इसकी उत्तरी चोटी पर कार्तिकेयपुर राज्य बसा था जिसके अवशेष आज भी यहां दिखाई पडते हैं। पहाड की चोटी पर बसे कौसानी के दोनों ओर दूर-दूर तक फैली हरी-भरी घाटी है। अगस्त-सितंबर माह में रंग-बिरंगे फूल और उनकी वन्य गंध घाटी में चारों ओर फैल जाती है।
आगंतुक आश्चर्य चकित सा फूलों के इन्द्रधनुषी संसार को देख प्रकृति की इस अद्भुत चित्रकारी पर ठगा सा रह जाता है। कौसानी के कण-कण में सौंदर्य बिखरा पडा है। यहां आकर उदासी और निराशा से भरे चेहरे भी खिल उठते हैं। दूर तक फैली घाटी, सघन वन शोख फूलों की बहार, रसीले फूलों की छटा, बादलों की लुकाछिपी के बीच सरल जन जीवन सैलानियों का मन मोह लेता है। इसलिए कौसानी को भारत का स्विट्जरलैंड भी कहा जाता गया है। अनासक्ति आश्रम के प्रांगण से सूर्योदय का अद्भुत नजारा देखने के लिए अलस्सुबह पर्यटकों की भीड जमा हो जाती है। कौसानी का सूर्योदय दृश्य जग विख्यात है। अंधेरे को चीरता हुआ जब सूर्य एक प्रकाश पुंज की शक्ल में हिमशिखरों के पीछे से क्षितिज में उभरता है तो सूर्य के बढते आकार के साथ पल-पल रंग बदलता दृश्य देखने लायक होता है। पर्यटक भी प्रकृति के इस अद्भुत नजारे को अपने कैमरे में कैद करने से नहीं चूकते।
सुमित्रा नंदन पंत की जन्मस्थली
हिंदी के सुविख्यात कवि सुमित्रा नंदन पंत का जन्म कौसानी में ही हुआ था। उनकी कविताओं में प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों के सहज व सरस चित्रण के ही कारण उन्हें प्रकृति का सुकुमार कवि भी कहा गया है। कौसानी बस स्टेशन से कुछ ही दूरी पर सुमित्रा नंदन पंत का पैतृक निवास है। यहीं पंत जी का बचपन बीता था। इस भवन को अब राज्य सरकार ने संग्रहालय का रूप दे दिया है। यहां पंत जी के दैनिक उपयोग की वस्तुएं, कविताओं की पांडुलिपियां, पत्र आदि रखे हुए हैं। साहित्य प्रेमी पर्यटकों को यहां पहुंचकर असीम सुख व शांति की अनुभूति होती है। अनासक्ति आश्रम से एक किलोमीटर की दूरी पर लक्ष्मी आश्रम पहाड की अग्रणी संस्था है।
सरला बहन का कर्मक्षेत्र
गांधी जी की अनन्य शिष्या सरला बहन यहां रहकर आजीवन समाजसेवा में जुटी रहीं। उन्हीं की प्रेरणा से यह आश्रम स्थापित किया गया है। आश्रम में पहाड की महिलाओं की शिक्षा, जागरूकता व आर्थिक स्वावलंबन से संबंधित गतिविधियां संचालित की जाती है। घने जंगल के बीच आश्रम का एकांत मन मोह लेता है। यहां से हिमालय की हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखला का भव्य दिखाई देता है। कौसानी के दुर्गम पहाडी रास्तों को तय करने के बाद लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर ऊंचे पर्वत शिखर पर पिनाकेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। शिव के अधिकांश मंदिर जहां नदियों या जलाशय के किनारे होते हैं, पिनाकेश्वर इसका अपवाद है। प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां मेला लगता है। इसके आसपास गोपाल कोट, हुरिया और बूढा पिनाकेश्वर आदि स्थल भी पर्यटकों को अपनी सुंदरता से अभिभूत कर देते हैं।
कैसे
कौसानी पहुंचने के लिए काठगोदाम अंतिम रेलवे स्टेशन है। वहां से कौसानी पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक काठगोदाम से अल्मोडा होकर और दूसरा भवाली-रानीखेत होता हुआ कौसानी पहुंचता है। काठगोदाम से अल्मोडा होकर कौसानी की दूरी 142 किमी और रानीखेत से होते हुए 146 किमी है। रानी खेत की सुंदर, हरी घास से भरी-पूरी पहाडी ढलानों को पीछे छोडता हुआ कौसानी तक का पूरा रास्ता कोसी घाटी के सुंदर दृश्यों से होकर गुजरता है। यह मार्ग चीड के घने वनों की भीनी सुगंध से भरा और हर मोड एक अद्भुत प्राकृतिक दृश्य को समेटे है। प्रकृति के इन मोहक रूपों के बीच यात्रा में कहीं भी थकान का अनुभव नहीं होता। यदि मौसम खुला हुआ हो तो सामने हिमालय के रजत से चमकते हिमशिखरों के दर्शन से मन प्रसन्न हो उठता है।
कहां रुकें
कौसानी में आधुनिक सुविधाओं से युक्त अनेक बढिया होटल, गेस्ट हाउस व रेस्तरां हैं। ट्रैकिंग के लिए यहां कई विशेष आकर्षण हैं और आसपास ऐसे कई रमणीक स्थान हैं जहां पहुंचकर आप अपने भ्रमण को यादगार बना सकते हैं। हजार वर्ष पुराने बैजनाथ के प्रसिद्ध मंदिर यहां से एक हजार किलोमीटर दूर हैं। गोमती व सरयू के संगम पर स्थित बागेश्वर कस्बा 26 किलोमीटर है।

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