बड़े शौक से ताजा फूलों के महकदार गजरे धारण करती हैं और इससे उनके चेहरों पर जो सौम्यता व संतुष्टि दिखती है, वही मैसूरवासियों की खास पहचान है। बाहर के उन पयर्टकों के लिए स्त्रियों के इस सुख के रहस्य को समझना कठिन है जो मैसूर को महज एक चंदन नगरी से अधिक नहीं समझते, पर सच्चे सैलानियों के लिए यह शहर महज एक नगरी नहीं है बल्कि उससे परे भी बहुत कुछ है।

चंदन की खुशबू से महकता शहर

भारत के सबसे सुंदर शहरों में एक कर्नाटक की राजधानी बंगलौर से महज 140 किमी की दूरी पर स्थित मैसूर एक ऐसा स्थान है जो एक बार देख लेने के बाद बार-बार याद आता है। चंदन की खुशबू से महकते इस शहर में चमेली, मोगरा, गुलाब की सुगंध इस तरह समाई है कि जो भी यहां आए सराबोर हो जाए। राजमहल, चंदन, चामुंडी हिल्स, अगरबत्तियां, इत्र व वृन्दावन गार्डन्स इतना कुछ यहां है कि सबके बारे में लिख पाना बहुत मुश्किल है। इस तरह मैसूर सिर्फ देखने की नहीं, बल्कि रच-बस जाने लायक शहर है।

मैसूर के चंदन से बनी छोटी-बड़ी चीजें, अगरबत्तियां व महकदार साबुन विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। यहां अगरबत्ती की हर बत्ती हाथ से बनाई जाती है जिसे सामान्यतया औरतें और बच्चे ही बनाते हैं। मैसूर का पूरा बाजार ऐसी दुकानों से पटा है जहां हस्तकला की छोटी-बड़ी चीजें बेची जाती हैं। हाथी दांत, चंदन और रोजवुड से बना फर्नीचर मैसूर की खास पहचान है। सामान्य लकड़ी या विशुद्ध चंदन से बने बेशकीमती हाथी यहां की हर दुकान पर मिल जाएंगे।

मैसूर के महाराजा का महल मैसूर की खास शान है। यह महल 1907 में बनाया गया था। उस जमाने में इसकी लागत करीब 42 लाख रुपये आई थी। उस पुराने महल के अंदर रंगीन कांच और दर्पणों का बहुत ही खूबसूरत काम है। विशेष रूप से अंदर की छतें, कांच कला का अद्भुत नमूना हैं। फर्श में लकड़ी का बहुत सुंदर काम किया गया है। महल के एक हिस्से की दीवारों पर चित्रकारी है, जिनमें ब्रिटिश राज के दौरान मैसूर के जनजीवन का अपूर्व चित्रण है।

महल का अपना एक अलग मंदिर भी है जिसका गोपुरम महल की चारदीवारी के अंदर है। इसके परिसर में एक अलग म्यूजियम भी है। मैसूर के आसपास देखने को इतना कुछ है कि सब कुछ देखने के लिए कम से कम एक सप्ताह तो चाहिए ही। मैसूर के दक्षिण में नंजनगढ़ और अभूतपूर्व चामुंडी हिल्स हैं। लगभग तीन हजार फुट की ऊंची पहाड़ी पर चामुंडेश्वरी देवी का मंदिर है, जहां बस से घूमते हुए आधा दिन गुजारा जा सकता है। धार्मिक वृत्ति के लोग यहां पैदल आते हैं, जिनके लिए पहाड़ी की एक साइड में एक हजार सीढि़यों वाला रास्ता है। इस रास्ते में नंदी की एक बहुत बड़ी प्रतिमा भी है। पांच मीटर ऊंची यह प्रतिमा कर्नाटक की सबसे बड़ी नंदी प्रतिमाओं में गिनी जाती है। चामुंडेश्वरी देवी के मंदिर में सात मंजिल का 40 मीटर ऊंचा गोपुरम है जो मैसूर में काफी दूरी से देखा जा सकता है। चामुंडी हिल्स से पूरे मैसूर का विहंगम दृश्य बहुत सुंदर लगता है।

मैसूर से बांदीपुर और नागरहोल जैसे प्रसिद्ध अभयारण्यों की दूरी बस से डेढ़ घंटे में तय की जा सकती है। यहां का चर्च काफी पुराना है और अगर आपकी इस बात में दिलचस्पी है कि पिछली सदी में ईसाई कहां तक पहुंचे थे तो आप इस चर्च को अवश्य देखें। यह भारत की बड़ी चर्चो में से एक है।

श्रीरंगपट्टनम

मैसूर से सिर्फ 16 किमी की दूरी पर रंगपट्टनम है, जो कभी हैदरअली और टीपू सुलतान की राजधानी थी। 1799 में अग्रेज टीपू सुलतान को हराने के बाद ही दक्षिण भारत में अपनी जड़ें जमा सके थे। श्रीरंगपट्टनम में एक म्यूजियम और दरिया दौलत बाग देखने लायक जगहें हैं। यहां से थोड़ी दूरी पर रंगनाथिट्टू पक्षी अभयारण्य है। कावेरी नदी से कटकर एक द्वीप में समाहित यह अभयारण्य पूरे वर्ष कई तरह के पक्षियों से भरा रहता है। नौका से इस द्वीप के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाया जा सकता है। मैसूर प्रवास के दौरान शहर के शोर-शराबे से मन ऊबने लगे तो आप इस शांत वातावरण में आकर हरियाली, प्रकृति और पक्षियों के बीच एक अलग तरह के सुकून का अनुभव कर सकते हैं

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