चिलचिलाती गर्मी और महानगर की आपाधापी से मन ऊबा तो हमने लंबी यात्रा का मन बनाया और पूर्वी हिमालय की गोद में बसे दार्जिलिंग के लिए चल पड़े। पश्चिम बंगाल के उत्तरी छोर पर स्थित इस मनोरम स्थल तक पहुंचने के लिए दिल्ली से हमें गोहाटी रेलमार्ग पर स्थित न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पहुंचना था। न्यू जलपाईगुड़ी से हम सिलीगुड़ी पहुंचे। सिलीगुड़ी अपने आपमें कोई पर्यटन स्थल तो नहीं है, लेकिन इसे कई पर्वतीय पर्यटन स्थलों का प्रवेश द्वार कहा जाता है। यहां से दार्जिलिंग के लिए टैक्सी, जीप, बस और टॉय ट्रेनें जाती हैं। घुमावदार पहाड़ी मार्ग की यात्रा के लिए टॉय ट्रेन हमें सबसे अच्छा विकल्प लगी और सिलीगुड़ी जंक्शन से अगले दिन सुबह की पहली ट्रेन से हम दार्जिलिंग चल पड़े।

खिलौना गाड़ी का सफर

लगभग दस किलोमीटर का मैदानी रास्ता तय करने के बाद टॉय ट्रेन पर्वतीय मार्ग पर बढ़ती है। देवदार, ताड़ और बांस आदि के पेड़ों से भरे इस मार्ग पर यह अनोखी ट्रेन ठुमक-ठुमक कर चल रही थी। लगभग 15 किलोमीटर प्रति घंटा की धीमी गति से चलती ट्रेन से पर्यटकों को प्रकृति के मनोरम दृश्य देखने का भरपूर आनंद मिलता है। दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की इस यात्रा में सबसे ज्यादा प्रसन्नता इस बात की होती है कि हम उस रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे हैं जिसे यूनेस्को से विश्व धरोहर का दर्जा हासिल है। मार्ग में तिनधरिया स्टेशन के पास टॉयट्रेन एक वृत्ताकार लूप से गुजरती है। प्रकृति की सुंदरता के दुर्लभ दृश्य यहीं से शुरू होते हैं। पहाड़ की ढलानों पर फैली हरियाली के बीच से होकर कई छोटे-बड़े गांवों को पार करती ट्रेन आगे बढ़ती रहती है। इसके साथ ही सड़क मार्ग भी चलता रहता है। कई स्थानों पर तो रेलवे लाइन और सड़क एक-दूसरे को काटती हुई चलती हैं। पूरे मार्ग पर 132 क्रॉसिंग हैं और सभी अनियंत्रित हैं। इसी कारण पर्यटकों को यहां के स्थानीय जीवन की झलक बराबर नजर आती रहती है।

कुर्सियांग पहुंचकर तो सब कुछ रेलवे लाइन के एकदम निकट लगने लगता है। सैलानियों को यह देखकर आश्चर्य होता है कि रेलगाड़ी मानो दुकानों और घरों को एकदम छूकर निकल रही है। यहां के लोगों को इस सबसे कोई असुविधा नहीं होती, क्योंकि रेलगाड़ी की गति बहुत कम होती है। चलती गाड़ी में चढ़ना-उतरना इन लोगों के लिए शगल नहीं बल्कि रुटीन है। इस अनोखी खिलौना रेलगाड़ी की शुरुआत 122 वर्ष पूर्व हुई थी। पहले इस पूरे मार्ग पर भाप इंजन का ही प्रयोग होता था। लेकिन अब पुराने पड़ गए भाप इंजनों की सुरक्षा तथा इस रेलपथ की ऐतिहासिकता को बरकरार रखने के उद्देश्य से इस मार्ग पर विकल्प के रूप में डीजल इंजन का ही प्रयोग होता है। गहरी घाटियों, दूर तक फैले चाय बागान, कृत्रिम पुलों और छोटी-छोटी सुरंगों को पार करती हुई यह ट्रेन जब घूम स्टेशन पहंुचती है तो पर्यटक रोमांचित हो उठते हैं। इस रोमांच का एक कारण यह है कि 7408 फुट की ऊंचाई पर स्थित यह स्टेशन संसार के नैरो गेज रेलपथ का दूसरा सबसे ऊंचा स्टेशन है। दूसरा कारण है घूम के निकट स्थित बतासिया लूप। इस लूप का चक्कर काटते समय ट्रेन की खिड़की से दिखते नैसर्गिक दृश्य तो जैसे सम्मोहित ही कर लेते हैं। घूम के बाद दार्जिलिंग की ओर बढ़ते हुए ट्रेन नीचे की ओर बढ़ती है। क्योंकि दार्जिलिंग की ऊंचाई घूम से कम है। चारों तरफप्रकृति के मनोहारी दृश्यों को देखते हुए सफर के दौरान थकान की ओर ध्यान नहीं गया। किंतु दार्जिलिंग स्टेशन पर उतरने पर हमें थकान का एहसास हुआ। होटल स्टेशन से अधिक दूर न था। इसलिए तुरंत सामान उठवा कर हम होटल आ गए। शाम हो चली थी, इसलिए अगले दिन के लिए साइट सीन तय करने के अलावा हमने विश्राम करना उचित समझा।

तूफानों की धरती पर

विविधतापूर्ण प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विख्यात दार्जिलिंग की आबादी में भी विविधता है। नेपाली, भोटिया, लेपचा और नेवाड़ लोग इस जिले के मुख्य निवासी हैं। इनके अलावा बंगाली और मारवाड़ी भी यहां आ बसे हैं। दार्जिलिंग का पुराना नाम दोर्जीलिंग था। सदियों पहले यहां एक छोटा सा गांव था। यहां बर्फीले तूफान आते रहते थे। बाद में यहां कुछ बौद्ध लामा आए तो उन्होंने यहां एक बौद्ध मठ की स्थापना की और वे इस स्थान को दोर्जीलिंग कहने लगे। ‘दोर्जीलिंग’ का अर्थ होता है ‘तूफानों की धरती’।समय के साथ यह नाम बदल कर दार्जिलिंग हो गया। कभी यह क्षेत्र सिक्किम का हिस्सा था। फिर यह नेपाली राजाओं के कब्जे में आया। बाद में अंग्रेजों ने इसे पर्वतीय सैरगाह के लिए उपयुक्त जानकर इस पर अधिकार कर लिया। तब से यह पश्चिम बंगाल का हिस्सा है। चाय के शौकीन अंग्रेजों ने इस क्षेत्र की आबोहवा को चाय की खेती के योग्य पाकर यहां चाय बागान विकसित किए। तब से इस क्षेत्र का वास्तविक विकास शुरू हुआ। आज दार्जिलिंग एक बेमिसाल पर्यटन स्थल है। चाय की खेती के लिए अंग्रेजों ने नेपाल से गोरखा मजदूरों को यहां लाकर बसाया था। बाद में सिक्किम, भूटान और तिब्बत से भी आकर लोग यहां बस गए। अस्सी के दशक में अलग राज्य तो नहीं, लेकिन इस क्षेत्र के लिए ‘गोरखा हिल काउंसिल’ का गठन अवश्य किया गया। आज भी यही काउंसिल इस क्षेत्र की व्यवस्था देखती है।

होटल मैनेजर ने हमारे लिए जीप से स्थानीय भ्रमण टूर बुक करा दिया था। जीप में हमारे साथ दो युगल और थे। कुछ देर में जीप मुख्य मार्ग पर आ गई। जहां तक नजर जाती हमें चाय बागान ही नजर आते। इन बागान को निकट से देखने का अवसर तब मिला जब ड्राइवर ने जीप हैप्पी वैली टी एस्टेट पर रोकी। यहां हमने देखा चाय की पत्तियां कैसे चुनी जाती हैं। तीन फुट ऊंचे झाड़ीनुमा पौधों के बीच काम करते स्त्री-पुरुष किस तेजी से सही पत्ती चुनकर, पीठ पर लटकी टोकरी में डालते रहते हैं। चाय के ये बागान जहां दार्जिलिंग के पहाड़ी सौंदर्य में गहरा हरा रंग भरते हैं, वहीं यहां की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। इन पहाड़ों से जंगलों को हटाकर 1840 में यहां चाय की खेती शुरू की गई थी। आज वहीं की उपज ‘दार्जिलिंग चाय’ दुनिया भर में इतनी प्रसिद्ध है कि इसे पूरब की शैम्पेन की उपमा भी दी जाती है। इस क्षेत्र में छोटे-बड़े 78 चाय बागान हैं। इनमें चाय की कई किस्में पैदा की जाती हैं। कुर्सियांग के निकट कैसल्टन टी एस्टेट की चाय तो इतनी उच्च गुणवत्ता की होती है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी कीमत दस हजार रुपये प्रति किलोग्राम को भी छू चुकी है।

एक हिमालय छोटा सा

हैप्पी वैली टी एस्टेट से निकलकर हम हिमालय पर्वतारोहण संस्थान पहुंचे। हिमालय के शिखरों को छू लेने की चाह रखने वालों को यहां पर्वतारोहण का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसकी स्थापना एवरेस्ट पर पहली बार फतह के बाद की गई थी। शेरपा तेन सिंह लंबे अरसे तक इस संस्थान के निदेशक रहे। संस्थान में एक महत्वपूर्ण संग्रहालय भी है। इसमें पर्वतारोहण के दौरान उपयोग में आने वाले कई नये-पुराने उपकरण, पोशाकें, कई पर्वतारोहियों की यादगार वस्तुएं और रोमांचक चित्र प्रदर्शित किए गए हैं। एवरेस्ट विजय से पूर्व के प्रयासों का इतिहास तथा वृहत्तर हिमालय का सुंदर मॉडल भी यहां देखने को मिलता है। इसके साथ ही नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम है। इस अनूठे संग्रहालय में हिमालय क्षेत्र में पाए जाने वाले करीब 4300 प्राणियों का इतिहास क्रम दर्ज है। हिमालय क्षेत्र के पशु-पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियों के नमूनों के अलावा खास अयस्क और चट्टानों के नमूने भी यहां पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इसके निकट ही स्थित है पद्मजा नायडू हिमालयन चिडि़याघर, जो बच्चों को ही नहीं बड़ों को भी बहुत पसंद आता है। पर्वतों पर रहने वाले कई दुर्लभ प्राणी यहां देखने को मिलते हैं। इनमें खास हैं- लाल पांडा, साइबेरियन टाइगर, स्नो ल्योपार्ड, हिमालयन काला भालू। इनके साथ पहाड़ी उल्लू, याक, हिरन तथा कई तरह के पहाड़ी पक्षी भी यहां देखे जा सकते हैं।

जॉय राइड का लुत्फ

हमारा अगला दर्शनीय स्थल था, उत्तर भारत का पहला रच्चु मार्ग – रंगीत वैली रोपवे। जिस समय हम यहां पहुंचे, काफी भीड़ थी। यहां लोहे के मोटे तारों पर झूलती ट्रॉली में बैठ कर पर्यटक नीचे सिंगला बाजार तक जाकर ऊपर आते हैं। रंगीत घाटी के ढलानों के निकट मंडराते आवारा बादलों को छूते हुए नीचे जाने और आने का अलग ही रोमांचक अनुभव होता है। रंगीत वैली रोपवे की जॉय राइड का आनंद लेने के बाद तिब्बत शरणार्थी सहायता केंद्र पहुंचते हैं। तिब्बत पुनर्वास के लिए 1959 में स्थापित किए गए इस केंद्र पर हमने देखा, किस तरह इन शरणार्थियों ने मेहनत और लगन के बल पर स्वयं को स्वावलंबी बनाया। उनके द्वारा बनाए गए ऊनी कपड़े, गलीचे, हाथ की कारीगरी वाली लकड़ी की चीजें और ज्वेलरी आदि यहां आने वाले पर्यटक जरूर खरीदना चाहते हैं। दुनिया का सबसे ऊंचा और सबसे छोटा लेबांग रेसकोर्स भी दार्जिलिंग में ही है। यहां शरद और वसंत ऋतु के दौरान घुड़दौड़ का आयोजन किया जाता है। लॉयड वनस्पति उद्यान पर्वतीय वनस्पतियों का भंडार है। लगभग 40 एकड़ में फैले इस उद्यान में पहाड़ी पेड़-पौधों, फूल और ऑर्किड का नायाब संग्रह पर्यटकों को मुग्ध कर देता है। यहां का ग्रीन हाउस भी देखने योग्य है। आस-पास की जगहों की घुमक्कड़ी के बाद हम वापस होटल आ गए।

यहां यह देखा जा सकता है कि नेपाली मूल के गोरखा लोग व्यवसाय की दुनिया में भी किस तरह सक्रिय और सफल हैं। नेपाली मूल के तमाम समृद्ध लोगों की यहां अच्छी दुकानें और मकान हैं। बेकरी और जनरल स्टोर के अलावा उन्होंने यहां कई अच्छे रेस्टोरेंट और होटल भी खोल रखे हैं। स्कूल यूनिफॉर्म में आते-जाते तमाम नेपाली बच्चों को देखकर यह भी जाहिर हो जाता है कि इन लोगों में शिक्षा के प्रति भी गहरा रुझान है। यहां के व्यावसायिक जगत में बंगाली और मारवाड़ी लोगों की भी अच्छी हिस्सेदारी है।

सूरज के स्वागत में

अगले दिन सुबह बहुत जल्दी उठकर हमें तैयार होना पड़ा। क्योंकि मुंह अंधेरे ही हमें दार्जिलिंग से 13 किलोमीटर दूर टाइगर हिल पहुंचना था। समुद्र तल से 8482 फुट की ऊंचाई पर स्थित टाइगर हिल सूर्योदय के अद्भुत नजारे के लिए प्रसिद्ध है। सुबह चार बजे ही जीप हमारे होटल के सामने आ पहुंची। ठंड से ठिठुरते हुए हम टाइगर हिल के लिए चल पड़े। वहां दूर तक जीप और टैक्सियों की कतार लगी थी। वहां पहुंचे पर्यटकों का हुजूम देखकर लगा जैसे पूरा देश ही सूर्य के स्वागत में टाइगर हिल पर आ खड़ा हुआ हो। ड्राइवर ने हमें बताया कि यहां रोज ऐसी ही भीड़ होती है। हालांकि कभी-कभी मौसम खराब होने पर सैलानियों को निराश लौटना पड़ता है। यह हमारा सौभाग्य था कि उस दिन मौसम साफ था। कुछ देर बाद ही आकाश से कालिमा छंटने लगी और उजाला बढ़ने लगा। सभी बेचैनी से उस पल की प्रतीक्षा करने लगे जब बाल अरुण के दर्शन होंगे। कुछ क्षण बाद ही नारंगी गोले का किनारा नजर आने लगा और देखते ही देखते उदय होता सूर्य अपनी नारंगी छटा बिखेरने लगा। इसका प्रभाव सामने खड़ी पर्वत श्रृंखला पर साफ दिख रहा था।

कंचनजंघा और अन्य हिमशिखरों पर सूर्य की पहली किरण ने अपना नारंगी रंग फैला दिया जो कुछ क्षण बाद ही सुनहरे रंग में परिवर्तित हो गया। सूर्य की किरणें कुछ तेज हुई तो ऐसा लगने लगा कि पर्वतों पर चांदी की वर्षा हो गई हो। जैसे-जैसे सूर्य आगे बढ़ने लगा, सभी हिमाच्छादित पर्वत श्रेणियां दूध सी सफेद नजर आने लगीं। सूर्योदय के साथ ही पल-प्रतिपल रंग बदलती पर्वतमाला का ऐसा अविस्मरणीय दृश्य देख पर्यटक अवाक रह जाते हैं। पहाड़ों की ऐसी ही खूबसूरती को निहारने के लिए हम वहां काफी देर तक रुके। वहीं हमें पता चला कि मौसम यदि बिलकुल साफ होता है तो यहां से एवरेस्ट की चोटी के दर्शन भी हो जाते हैं। हम तो बस कंचनजंघा के ही दर्शन कर सके, जिसे स्थानीय लोग देवी के समान मानते हैं। टाइगर हिल के निकट ही एक टूरिस्ट लॉज भी मौजूद है।

संग्रह पांडुलिपियों का

टाइगर हिल से वापस आते हुए हमने आकर्षक सेंचल झील भी देखी। यह एक सुंदर पिकनिक स्पॉट है। वहां से हम घूम मॉनेस्ट्री देखने पहुंचे। यह दार्जिलिंग का एक प्रसिद्ध और सुंदर बौद्धमठ है। यहां स्थापित मैत्रेयी बुद्ध की ऊंची सुनहरी प्रतिमा अत्यंत मनभावन है। इस प्राचीन मठ में कई दुर्लभ पांडुलिपियों और बौद्धग्रंथों का संग्रह है। दुनिया भर से तमाम श्रद्धालु और शोधार्थी खास तौर से इसे ही देखने के लिए दार्जिलिंग आते हैं। मठ से कुछ ही दूरी पर बतासिया लूप में युद्ध स्मारक भी है। यह स्मारक शहीद सैनिकों की याद में बनवाया गया था। मार्ग में हमने प्रसिद्ध आवा आर्ट गैलरी देखी और धीरधाम मंदिर के दर्शन भी किए।

दोपहर बाद हम मालरोड चौरास्ता की रौनक का लुत्फ उठाने चल दिए। रास्ते में लाडेन ला रोड और नेहरू मार्ग पर कई होटल, रेस्टोरेंट और बार हैं। यहां इंडियन, चाइनीज और कांटिनेंटल भोजन के अलावा सैलानी तिब्बती भोजन का स्वाद भी ले सकते हैं। रास्ते में अच्छा-खासा बाजार है। चौरस्ते पर भी कुछ अच्छे शोरूम, रेस्टोरेंट और फास्टफूड पार्लर हैं। यही एक मार्ग मालरोड कहलाता है। दार्जिलिंग का चौरास्ता, शिमला के स्केंडल प्वाइंट के समान है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के कारण वहां हर समय चहल-पहल बनी रहती है। यहां एक छोटा सा उद्यान भी है। मालरोड पर पर्यटक घुड़सवारी का आनंद भी ले सकते हैं। अगर आपको पैदल चलने का शौक है तो यहां से कुछ ही दूरी पर स्थित भोटिया बस्ती मॉनेस्ट्री, सैट एसाइड प्वाइंट, ऑब्जरवेटरी हिल और काली मंदिर भी देख सकते हैं। यहीं पास के बाजारों में अच्छे शो-रूम या दुकानों पर शॉपिंग का शौक भी पूरा किया जा सकता है।

हस्तकला बंगाल की

पश्चिम बंगाल का मंजूषा एंपोरियम भी नेहरू मार्ग पर है। हाथ से बनाई गई यहां की अनुपम कलात्मक वस्तुओं और उनके बहुरंगी पारंपरिक डिजाइनों से मिली-जुली पर्वतीय संस्कृति की झलक साफ नजर आती है। इनमें खास हैं- आभूषण, दीवालगीर, फायर स्क्रीन, भूटानी चित्र, तिब्बती मुखौटे, थैले, बांस की सुंदर कारीगरी की वस्तुएं, लकड़ी के आकर्षक पार्टीशन आदि। इनके अलावा बुने हुए ऊनी कपड़े और कालीन आदि भी यहां मिलते हैं। महात्मा बुद्ध के जीवन को चित्रित करती थंका चित्रकारी भी सैलानियों को खास तौर से पसंद आती है। ट्रेकिंग के शौकीन लोगों को भी दार्जिलिंग के आस-पास की पहाडि़यां बहुत आकर्षित करती हैं। इस इलाके में बीजनबाड़ी, माने भंजन फलूत, संदक्फू और रिम्बिक आदि ट्रेकिंग के शौकीन लोगों के लिए आदर्श ठिकाने हैं। चारों तरफ बिखरी प्राकृतिक संपदा के बीच ये स्थान आज भी अनछुए से लगते हैं।

धुंध को चीरते हुए

मिरिक और कलिम्पोंग देखे बगैर दार्जिलिंग का सफर अधूरा सा लगता है। अगली सुबह जब हम होटल से बाहर निकले तो हर तरफ कुहासा छाया हुआ था। साढ़े नौ बजे जब कुहासा छंटने लगा तब हमारी बस मिरिक के लिए चली। रास्ते भर सड़क के दोनों ओर कभी चाय बागान नजर आते और कभी हरे-भरे जंगल। करीब ढाई घंटे में हमारी बस मिरिक पहुंच गई। ठहरने की व्यवस्था हमने पहले ही टूरिस्ट लॉज में कर रखी थी। घुमावदार रास्तों की थकान मिटने के बाद हम अपनी स्मृतियों और कैमरे में मिरिक का सौंदर्य कैद करने के लिए निकल पड़े। समुद्र तल से 5800 फुट की ऊंचाई पर बसा यह छोटा सा पर्यटन स्थल करीब साढ़े तीन सौ फुट के दायरे में फैला है। हर तरफ पहाड़ों से घिरी छोटी सी मनोरम घाटी में स्थित मिरिक भीड़-भाड़ से अलग एक शांतिपूर्ण सैरगाह है। घूमने के लिए यहां किसी वाहन की जरूरत भी नहीं होती। जहां चाहें पैदल ही निकल जाएं। प्रकृति आपके स्वागत में बांहें पसारे नजर आएगी। यहां का मुख्य आकर्षण है झिलमिल सौंदर्य वाली मिरिक झील। इसकी सुंदरता का आलम यह है कि जिस ओर से भी देखें यह एक अलग ही रूप में नजर आती है। इसलिए पर्यटक झील के किनारे बने तीन किलोमीटर से भी लंबे पैदल रास्ते पर चहलकदमी करते हुए इसे हर दिशा से निहारते हैं। झील पर बने पुल से झील में पर्वतों और पेड़ों का लुभावना प्रतिबिंब नजर आता है। यह प्रतिबिंब यहां आने वाले पर्यटकों का मन मोह लेता है। बारहों महीने कलकल करते रहने वाले झरनों और बरसाती पानी से लबालब भरी झील में सैलानी बोटिंग का भी भरपूर आनंद लेते हैं।

दूसरा दिन भी हमने मिरिक में बिताया। कुहासे और ठंड के कारण हम काफी देर से लॉज के बाहर आए। यहां के उद्यान में पर्वतीय फूलों के रंगों की छटा बिखरी थी। आस-पास की पहाडि़यों पर चाय बागान के अलावा संतरों के बाग भी हैं। इन बागों में संतरों से लदे पेड़ देखने के लिए दो किलोमीटर दूर पैदल या घोड़ों पर जा सकते हैं। यह एक संतरा उत्पादक क्षेत्र भी है। यहां से बंगाल और आस-पास के राज्यों में संतरा भेजा जाता है। आस-पास के कुछ हिस्सों में यहां इलायची की खेती भी की जाती है। यहां भी कुछ व्यू प्वाइंट हैं, जहां से पर्वतीय और मैदानी इलाकों के खूबसूरत नजारे देखने को मिलते हैं। देवी स्थान पर देवी मंदिर के साथ भगवान शिव और हनुमान जी के मंदिर भी दर्शनीय हैं। वास्तव में शहर की गहमागहमी से परे कुछ दिन गुजारने हों तो मिरिक जैसी शांत और रमणीक सैरगाह शायद ही कोई और हो।

स्वर्ग फूलप्रेमियों का

मिरिक से कलिम्पोंग तक का मनोहारी रास्ता हमने टैक्सी से तय किया। रास्ते में तिस्ता नदी की खूबसूरती ने हमें बहुत प्रभावित किया। ड्राइवर ने बताया कि तिस्ता के तट पर जनवरी में बेनी मेले के अवसर पर बहुत पर्यटक आते हैं। उस समय लेपचा और भोटिया नववर्ष मनाया जाता है। इसके बाद फरवरी में तिब्बती नववर्ष पर भी इस क्षेत्र में उत्सवी माहौल होता है। इनके अलावा बुद्ध पूर्णिमा, दुर्गा पूजा और दीवाली भी यहां धूमधाम से मनाई जाती है। तिस्ता ब्रिज पार करके टैक्सी फिर ऊपर की ओर बढ़ने लगी। रास्ते में एक जगह टैक्सी रोक कर ड्राइवर ने हमें एक कुदरती नजारा देखने को कहा। उस व्यू प्वाइंट से हमें तिस्ता और रंगीत नदियों के संगम का अनुपम दृश्य देखने को मिला। विभिन्न दिशाओं से पहाड़ों से उतरती ये नदियां एक-दूसरे में आ समाती हैं। यह दृश्य अत्यंत मनोहारी है। वहां से कुछ देर बाद ही हम कलिम्पोंग पहुंच गए। यहां एक अच्छा सा होटल देख हमने उसमें चेक-इन किया। 4100 फुट की ऊंचाई पर बसा यह शहर मिरिक जैसा शांत तो नहीं है, लेकिन दार्जिलिंग जैसी भीड़ भी यहां नहीं थी।

इस छोटे से पहाड़ी शहर में पर्यटकों को सिक्किमी, भूटानी और तिब्बती संस्कृति का मिला-जुला रूप देखने को मिलता है। किसी जमाने में यह सिक्किम का हिस्सा था। तब यह तिब्बत से सिक्किम के व्यापार का बड़ा केंद्र था। कलिम्पोंग में साइटसीन प्वाइंट अधिक नहीं हैं। बस प्रकृति के अदृश्य स्पर्श का आनंद लिया जा सकता है। पर्यटकों के देखने के लिए यहां योग्सा मठ, फो ब्रांग मॉनेस्ट्री, थार्पा चाओलिंग मॉनेस्ट्री, ग्राहम होम्स और चर्च हैं। फूल प्रेमियों के लिए तो यह जगह स्वर्ग ही है। अनुकूल जलवायु के कारण यहां फूलों की खेती की जाती है। इसे भारत का हॉलैंड कहना गलत न होगा। यहां सैकड़ों नर्सरियां हैं, जहां तरह-तरह के फूल, ऑर्किड और कैक्टस देखने योग्य होते हैं। पर्यटक कुछ खास नर्सरियां देखने जरूर जाते हैं। कंचनजंघा और अन्य पर्वत श्रेणियों का अलग रूप देखना हो तो सैलानी देयलो हिल, दर्पिन दारा या 20 किलोमीटर दूर रिस्सम पहुंचते हैं। कलिम्पोंग आर्ट एंड क्राफ्ट सेंटर में कशीदाकारी के थैले, पर्स, बाल पेन, फायर स्क्रीन आदि हाथ की कारीगरी वाली चीजें देखी और खरीदी जा सकती हैं। वैसे सप्ताह में दो दिन लगने वाले बाजार में भी यहां की कला और शिल्प के साथ स्थानीय जीवन की झांकी भी देखने को मिलती है। दुकानों पर स्ति्रयां अधिक होती हैं। इन लोगों को यहां पारंपरिक वेशभूषा में देखा जा सकता है। ये लोग हिंदी, अंग्रेजी और बंगला भी आसानी से समझ लेती हैं।

कलिम्पोंग भ्रमण के साथ ही हमारी पर्वतीय त्रिकोण की यह यात्रा पूरी हो चली थी। प्रकृति से भरपूर इन स्थानों की यात्रा में हमने कंचनजंघा के पावन हिमशिखर, हरियाली से अटे हुए ढलान, कलकल करते झरने, उलझे हुए पहाड़ी रास्ते, बल खाती नदियां, आस्था जगाते गोंपा और विश्व धरोहर टॉयट्रेन इन सबको मन में आत्मसात सा कर लिया। इससे यह एक अविस्मरणीय यात्रा बन गई।

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